Tuesday, 16 February 2016

माँ...

मेरी माँ,मेरी राह,तकते नहीं थकती
जब तक नींद मुझे ना आये,आँख माँ की नही लगती

मेरी गलती लाख भारी हो,जी भर के कोस लेती है
डाँट झपट कितनी भी करे,फिर खाना परोस देती है

कहते हैं सठियाने पर कहाँ कुछ याद रहता है
मुझे खाने में पसन्द क्या है,उसे अभी भी याद रहता है

क्या कहूँ मेरी माँ के हाथो की दाल क्या स्वाद देती है
वो लम्हा याद आता है जब रोटी परोस कर माँ आवाज देती है

मुझपे आने वाली मुश्किलो से,मुझसे पहले टकराती है
कोई लड़ने गर मुझसे आये,माँ पहले भीड़ जाती है

पापा की डाँट झपट,जब मार पीट तक आती है
मेरी खातिर मम्मी पापा से भी झगड़ जाती है

कोई और साथ दे ना दे,माँ साथ देती है
लम्बा छोटा सफर जैसा हो,माँ खाना बांध देती है

मेरे कामकाज को लेकर जब परेशानियां मुझपे आती हैं
इधर मैं उदास होता हूँ,उधर माँ उदास हो जाती है

अ-माँ,मैं तुझे कभी भुलाना नहीं चाहता
इसलिए तेरी ममता का क़र्ज़ पूरा चुकाना नहीं चाहता........

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