Saturday, 4 January 2025

दंड-विधान

                                    दंड-विधान 

मुझे समझना है वह दंड विधान 

जो मेरे गलती करने पर 

बनाता है मुझे पापी 

और 

तुम्हें महान 


एक बंधन मे बंधे हम दोनों 

बराबर थे 

दोनों ही एक धरा पर थे 

फिर एक रोज

हुई मुझसे गलती ;और हमारा रिश्ता 

बन गया तुमपर बोझ ?


चलो मुझसे गलती हुई 

बना गया मैं अपराधी 

पर ;मुझे सजा देने की 

तुम्हें किसने  दी आजादी  ???


अस्वीकार्य है वो दंड विधान 

जो सजाएँ बांटता हो 

लिंग-भेद के अनुसार 

रिश्तों के अनुसार 

कमाई के अनुसार 

जरूरत के अनुसार 


गलती एक 

पर पुरुष और नारी को सजा मे भेद 

रिश्ता वही ;मेरी गलती तो गलती 

तुम करो तो वही सही 

क्या खुद को सही साबित कर पाते ?

क्या इन गलतियों पर सबको वही सजा दे पाते ?

मा-पिता को भी ;भाई  बहन को भी???

अगर उनसे भी यही 

या शायद इस से भी बड़ी गलती हुई होती 

या 

शायद हुई भी होगी..।।।

पर......  तुमने छिपा ली होगी 

और बात जब  मुझपर आई तो 

तुम करने लगे इंसाफ 

भूल गए सबके अपराध 

थोप दी मुझपर सारी सजा 

बन गए मेरे खुदा 


ये कैसा इंसाफ है 

तुम ज्यादा कमाते हो 

तो तुम्हें सब माफ है 

एक को सब सजा दी जाएगी 

दूसरे की जरूरत है तो गलती भूला दी जाएगी ?


समझाओ मुझे वो सामाजिक संविधान 

जिसमे अपराध और गलती 

दोनों ही  एक समान

तुमसे गलती हुई 

तुम माफ हुए 

मुझे गलती हुई तो मानो 

गलती नहीं पाप हुए 

लाओ जरा संज्ञान मे 

पैमाना आँकने का क्या है इस दंड विधान मे 


दवा और नशा 

श्रेया और प्रेया 

आलिंगन और आकर्षण 

चाहत और जरूरत 

अपशब्द किन्तु  अपनापन 

समझाओ दोनों मे अपराध क्या है और गलती क्या ?


ये कैसा विधान है 

जो हर हल पर प्रश्न खडा कर देता है 

केवल सजाओं के लिए गलतियों को  

छोटा और बड़ा कर देता है 


बकरी चोरी छोटी,पैसा चोरी अपराध बड़ा 

क्यूँ  गाली देना गलती छोटी,क्यूँ चरित्र हनन अपराध बड़ा 

क्यूँ तन पर घाव छोटे और मन पर घाव आघात बड़ा  

क्यूँ माफी छोटी, क्यूँ इंसाफ बड़ा

क्यूँ माफी छोटी-------क्यूँ इंसाफ बड़ा  


लंबा रस्ता तय करना है 

इस दंड विधान को एक तरफ रखना होगा 

और महत्व देना होगा 

इंसाफ से बढ़कर माफी को 

बीति जिंदगी भुलकर बाकी को 

प्रेम मे तुम्हें समर्पित हूँ 

ऐसा झूठा दंड विधान मेरा हकदार नहीं 

मतभेद मुझे स्वीकृत है 

मनभेद किंचित भी स्वीकार नहीं …

    

                                                         'गुरु'*


Thursday, 28 September 2023

ब्याह के लाया था


तुम्हें लगता है कि सिर्फ़ ब्याह कर लाया था 

सच कहूँ तो अपना सब कुछ लुटा के लाया था 


मैंने खोया है ख़ुदको बस और बस तुम्हारे  लिए

दोस्त,दफ़्तर,दारू सब दावँ पर लगा के लाया था


बची ज़िंदगी तुम्हारे साथ जीने का वायदा किया है 

अपने सपने बेचे,तुम्हारे सपने सजा के लाया था 


फ़ेरे,वरमाला,सिंदूर ये हवा हवाई नहीं है प्राणसखे

तुम्हें चाहता हूँ,इसलिए गले लगा के लाया था


 कई बार तुम्हारी बातें दिल में घाव रो करती हैं 

“गुरु”सोच के रह जाता है कि दिल में बसा के लाया था

Wednesday, 31 May 2023

वक़्त बुरा बस मुझपे ही थोड़ी आएगा,,,,waqt bura bus mujhse hi aayega

 “गुरु”ये वक़्त बुरा बस मुझपे ही थोड़ी आएगा 

हिसाब है…टाइम आने पर सबसे लिया जाएगा 


प्यादों से लड़कर राजा मंत्री अपना ही स्तर गिरा लेंगे 

प्यादा हूँ पलट कर भी बोलूँगा तो उनका दरबार गूंज जाएगा 


माना अफ़सरी में थोड़ी पैठ कम रखता हूँ साहब 

मगर चींटी हूँ…अपनी पे आया तो हाथी गिरा दिया जाएगा 


सारी मजबूरियाँ मेरे ही घर थोड़ी ना डेरा डालके रहेंगी

ईश्वर है…कुछ मजबूरियों को आपका भी पता दिया जाएगा


किसी श्रवण के माँ-बाप अगर तुम्हारे कारण दुखी है …

भगवान राम के पिता हो तुम,,,तब भी बख्शा नहीं जाएगा 


तुम्हारी क़िस्मत रेत छू कर सोना बना रही है और मेरी सोने से रेत

तुम्हें क्या लगता है????समय पलटी नहीं खाएगा???


वो सबका हिसाब इसी जन्म में करेगा;मुझे यक़ीन है 

तुम मूल की फ़िक्र छोड़ो साहब,ब्याज भी लिया जाएगा


दुखते दिल की बद्दूआ से भगवान बचाये”गुरु”

चढ़ता सूरज है,न जाने कब ढल जाएगा

Tuesday, 30 May 2023

नौकरी ना हुई,ब्याह हो गया,,,,naukari na hui,byah ho gaya

 ससुरी नौकरी ना हुई, ब्याह हो गया….

लेके प्रमोशन मैं,दुल्हन सा घर से विदा हो गया


बिना बात नये अफ़सर हमसे ख़फ़ा से हैं 

कई तो बिन बात रूठने वाले फूफा से हैं 

मर्ज़ी की पोस्टिंग समझो सुंदर साली 

वरना बदसूरत साला हो गया….


ससुरी नौकरी ना हुई, ब्याह हो गया….


नये रीजनल ऑफिस वालों के सासु जैसे ताने 

कुछ तो लगते हैं जेठानी से तेवर दिखाने

पहले बताया था हमको रसोई की नॉलेज नहीं है 

डिनर पर पूछते हैं दाल का कैसे दलिया हो गया 


ससुरी नौकरी ना हुई, ब्याह हो गया….


कुछ अफ़सरों को तो रातभर पति जैसे झेलते हैं 

वो रात को ही व्हाट्सएप्प पर सारा ज्ञान पेलते हैं 

हमसे टारगेट थोड़ा सा कम क्या हुआ 

मानो उनकी सफ़ेद शर्ट पर हमसे लिपस्टिक का धब्बा हो गया 


ससुरी नौकरी ना हुई, ब्याह हो गया….


प्रपोज़ल के लिए वीसी ऐसे करते हैं ,दुल्हन के देवर हो मानो 

हमारे साइन पुराने कपड़े और इनके साइन सोने के ज़ेवर हो मानो 

मायके जाने की जब भी छुट्टी माँगी हमने 

मानो कोई बहुत बड़ा गुनाह हो गया 


ससुरी नौकरी ना हुई, ब्याह हो गया….


इस ससुराल को हमेशा दुल्हन पर शंका सी क्यों रहती है 

हमे सही कहने वाले ससुर की भला घर में कहाँ चलती है 

तलवे चाटू नन्द तो इतनी साफ़ सच्ची होती है मानो 

वो छुए तो करेला मीठा,हम छुए तो शहद कड़वा हो गया 


“गुरू” माना नई दुल्हन सबको अखरती है 

नई नमाज़ी है,थोड़ी देर नमाज़ ज़्यादा पढ़ती है 

पर आगे चलकर जब यही दुल्हन सास बनती है 

रिटायर्ड सास-ससुर,पति,देवर,जेठानी  की भी अम्मा लगती है 

फिर सब पूछते हैं,ये क्या से क्या हो गया 


ससुरी नौकरी ना हुई, ब्याह हो गया….


कुछ कमरों में उल्टी गंगा कैसी बहती है ,ईश्वर ही जाने 

यहाँ बेटे लगे हैं बाप को सुहागरात सिखाने 

पुराने फ़ील्ड वालों ने नये साहब को गलती क्या बताई 

मानो पाकिस्तान वालों का भारत से झगड़ा हो गया 


ससुरी नौकरी ना हुई, ब्याह हो गया….

Sunday, 4 December 2022

एक उलझन है........सुलझा दो ना

 एक उलझन है........सुलझा दो ना

हम में क्या रिश्ता है..समझा दो ना...


क्यों तुम्हारा हर पल इंतजार रहता हैं

बात करने को दिल बेकरार रहता है

पीने वाले पिएं दिन रात गांजा, शराब 

मुझ पर तो तुम्हारा नशा सवार रहता है

ये कैसे उतरेगा...कोई तो दवा दो ना

उलझन है...सुलझा दो ना


प्यार भरे तानो से क्यों घायल करते हो

चौबीसों घंटे दिल पर क्यों छाए रहते हो

दिल जिस्म नशा याद सपने तक तेरे 

फिर भी कहो; क्यूं बन के पराए रहते हो 

राज को राज कब तक रखें... छपवा दो ना

उलझन है...सुलझा दो ना...


रोज के कामों में जीना दुश्वार रहता है 

तेरे इश्क में दिल ये बीमार रहता है

यूं तो आलस से भरा रहता है बदन बावरा

पर तुम जब भी पुकारो,"गुरू"तैयार रहता है 

खूबसूरत बहुत हुं... वहम मिटा दो ना

उलझन है...सुलझा दो ना...

Wednesday, 22 January 2020

यादें तुम्हारी ले चले....


कर जिद्द हमारी,बातें तुम्हारी ले चले
तीन रोज़,दो रात में,यादें प्यारी ले चले

ज़िंदगी जीने का एक ओर सलिखा जान लिया
कुछ हमारी दे चले हम,कुछ तुम्हारी ले चले

चिकन ओर खीर की सांझी रसोई वाह तेरी
सुखी रोटी के मज़े लेकर,भूख अपनी दे चले

बहाने से जल्दी जाना,सुबह देरी से आना
होस्टल के रूम में रातें पुरानी ले चले

दोस्त सब नए थे,लेकिन थे सब के सब जिगरी
साथ हंसे-नाचे,मोबाइल में तस्वीर प्यारी दे चले

भाई जैसे शिक्षकों ने,पाठ ज़िन्दगी का यों सिखाया
मुस्कान की दौलत दे,आँसू की उधारी ले चले।।

अ मेरे प्यारे  STC,"गुरू" के तुझे सज़दे कई
बार-बार बुलाता रहे,हम बार बार गले मिलते रहे...

Wednesday, 1 August 2018

भाइयों से मुलाक़ात...

आज के अनुभव पर आधारित...

भाइयों में हुई बातें,दिल के खुले राज
जिनसे रोज़ होती थी बातें,मुलाक़ात हुई आज

सब मज़ेदार हैं,एक से एक असरदार हैं
बाहर से बॉस है,अंदर समेटे अलग किरदार हैं
सबको धन्यवाद,दिल से प्रशंसा,ढेर सारा पयार
 जिनसे रोज़ होती थी बातें,मुलाक़ात हुई आज


सच है कि व्यवहार कुर्सी का मोहताज नहीं
खुली किताब है सब,दिल में कोई राज नही
ऊपर से कबूतर दिखने वाले,अंदर से उड़ते बाज़
जिनसे रोज़ होती थी बातें,मुलाक़ात हुई आज

“गुरू”को ख़ुशी हुई,एक-एक से मिलकर आज
बंद उँगलियाँ मुट्ठी की,एक दूजे पर सबको नाज़
सब दिलो  के बादशाह,हँसी-ठिठोलि  के सरताज
जिनसे रोज़ होती थी बातें,मुलाक़ात हुई आज

दंड-विधान

                                             दंड-विधान  मुझे समझना है वह दंड विधान  जो मेरे गलती करने पर  बनाता है मुझे पापी  और  तुम्हें मह...