Tuesday, 1 May 2018

सब चलता है।।।

सब के मन मे एक वहम पलता है
ये घर है ग़ालिब, यहां सब चलता है।

दूसरे का सुकून यहाँ, सबको बिना बात खलता है
दूसरे की बीवी ओर अपना बच्चा सबको अच्छा लगता है
घर है ग़ालिब, सब चलता है

ऑफिस में जो गुसैल साहब,सबसे ज्यादा अकड़ता है
सच मानिये घर मे रात को वही बर्तन साफ करता है
घर है साहब,यहां सब चलता है

सुना है बड़े साहब बहुत शेर दिल इंसान है
फिर रात को कमरे में म्याऊँ-म्याऊँ कोन करता है
ये घर है ग़ालिब, सब चलता है

दूसरों के फ़टे में टांग कौन फँसाये जी
चोकीदार भी तनख्वाह के लिए कुत्तों से डरता है
घर है ग़ालिब,सब चलता है

घर से मतलब मुल्क से नही सरकार मेरे
वो करें तो सब सही,मैं लिखूं तब भी अखरता है
ये घर है,सब चलता है।।।।

सुबह से शाम तक "गुरू"की सुनता कोई नही
रात को घर आकर,बीवी बच्चों से लड़ता है
घर है ग़ालिब,सब चलता है

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