Tuesday, 28 November 2017

यहां पलकों पे बैठाया जाता है

ये सरकारी दफ्तर है जनाब....

यहां पलकों पे बैठाया जाता है
नज़रों से गिराने के लिए

बगल बैठे बाबू जी
मीठी छुरी से कम नही
तुमको फंसा जाएंगे एकदिन
खुदको बचाने के लिए
पलकों पे बैठाया....

सास-नन्द-जेठानी से कम कोई अधिकारी नही
बात-बात पर ताने मारते हैं,तुमको सताने के लिए
पलकों पे बैठाया......

10 से 5 की सरकारी नोकरी,कार-कोट-बंगले साहब
ख्वाब अच्छा था "गुरू" मन को बहलाने के लिए
पलकों पे बैठाया.....

हिंदी बोलकर हिन्द की कमियां गिनाते हैं,हिंदी के अधिकारी यहाँ
फिर हिंदी ज़रूरी बताते हैं देश मे दफ्तर चलाने के लिए

आगे की जिंदगी देखकर,दूसरी बीवी सी लगती है नोकरी
सो नखरे उठाने पड़ते हैं,थाली सजाने के लिए
पलको पे बैठाया जाता है....

मेरे -तेरे बीच की तकरार कुछ ऐसी है-अ-दफ़्तर 
मियां-बीवी की नोंक-झोंक ज्यों घर चलाने के लिये
पलकों पे बैठाया जाता है.....

मंदी के दौर में चलो,तीन चीजे तो जो दे वो ख़ुदा है
तन पे लिबाज़,थाली में पनीर,छत सर छिपाने के लिए
पलकों पे बैठाया जाता है.......


अ मेरे दफ्तर"गुरू"को दे दी ये कैसी अफसरी
ओर कोई रस्ता ढूंढ लेता सर खपाने के लिए।।



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