Saturday, 7 July 2018

Banker

बैंकर इंसान नही....

हाड-माँस के चिथड़े हैं
फट्टे हुए हैं,उधड़े हैं
आत्मा मर चुकी है
खूद से रहते चिड़े-चिड़े हैं
लोग हमें कुछ भी कह लेते हैं
ओर हम..सब कुछ सहते हैं...
शरीर छोड़िए,रूह तक में जान नही
क्यूँकि हम बैंकर हैं...ओर
बैंकर इंसान नही......

हमारे ही दफ़्तर में आकर हमें गाली सुनाये
कोलर पकड़ कर फ़र्श पर घिसटाए
कपड़े फाड़े-थप्पड़ मारे
सारा सामान उठाकर सर पर दे मारे
शरीर छोड़िए..गालियाँ खाकर आत्मा मर चुकी
अब रत्ती भर भी जान नही
क्यूँकि हम बैंकर हैं....ओर
बैंकर इंसान नही....


हमारा परिवार नहीं है
बीवी-बच्चे घर-बार नही है
हमारे माँ-बापू जी की उम्र नही बढ़ती
हमें कभी कोई बीमारी नही लगती
सबसे विचित्र हैं,कोई हमारे क़रीब नही होता
घर के लिए कमाते हैं,वही नसीब नही होता
हम निर्लज हैं,हमारा कोई आत्म सम्मान नही
क्यूँकि हम बैंकर हैं ...ओर
बैंकर इंसान नही ...

रोज़-मर्रा की ज़िंदगी ढंग से नही चला सकते
काम कर सकते हैं पर सवाल नही उठा सकते
बिना अपराध सज़ा पाकर रोष नही जता सकते
अर्थ-व्यवस्था बचाएँ,ख़ुद को नही बचा सकते
हमारे पास न  जिगर,न जिस्म,न दिमाग़ है


काम करने को हाथ है,पर सुनने को कान नही
क्यूँकि हम बैंकर हैं....  ओर
बैंकर इंसान नही.....

बच्चे एक साल में तीन स्कूल बदल लेते हैं
मैं घर ओर बाबू जी अपने दोस्त बदल देते हैं
बीवी नए शहर सब्ज़ी तक लाने नही जा सकती
बहन-बेटियां मिलने तक घर नही आ सकती
बसते घर में भी एक जगह टिकते सामान नही
क्यूँकि हम बैंकर हैं,,,ओर
बैंकर इंसान नही

हमें बुज़ुर्ग होने की इजाज़त नही
कोई अरमान कोई चाहत नही
लोगो की तरह फ़िल्म,परिवार संग घूमना,खाना
हमारी कोई आदत नही
हमें बैंक ओर देश की पूरी चिंता
हमारा किसी को ध्यान नही
क्यूँकि हम बैंकर हैं....
ओर बैंकर इंसान नही....

नोट बंदी में हमने ज़िम्मा सम्भाल था
तब मन में एक वहम पाला था
की चलो सबके काम आयें..
बूरे दौर में बैंक ओर देश के काम आए
नतीजा ये हुआ कि सब कुछ करके ज़ूते खाए
ना चैन से सो पाए,न चैन से खा पाए
जी भर मेरा इस्तेमाल किया ओर फिर कहा
हममें ईमान नही
क्यूँकि हम बैंकर हैं
ओर...बैंकर इंसान नही...

ना अनपढ ओर ना ही बेईमान भरे हैं
बैंक में आज के युवा सबसे ज़्यादा पढ़ें हैं
आधे से ज़्यादा भारत लोन की गाड़ी चलाता है
लोन से घर बनाता है
लोन से बच्चों को पढाता है
मंत्री जिस योजना के दम पर वोट पाता है
ऊन योजनाओं में बैंक हाथ बँटाता है
पैसे से सब चलता है
ओर बैंक पैसे को जनता बीच चलाता है
तुम कितने की अभिमानी हो...
या स्वाभिमानी हो...
पर इस सच को नही ठुकरा सकते
बिना बैंक जीकर नही दिखा सकते

हम मजबूत हैं
हम में ईमान है
स्वाभिमान हैं
ओर हाँ.......
हम भी आपकी तरह इंसान हैं

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