
वो मेरी" ना "समझती है,मेरी "हाँ" समझती है
मुझको सबसे ज्यादा बस माँ समझती है
मैं लाख लगालूं बहाने,वो मेरी एक ना माने
वो मेरे हालातों की हवा समझती है
मुझको सबसे ज्यादा बस माँ समझती है
मेरी आब-ओ-हवा,मेरा मन,मेरी दिनचर्या,मेरी पसंद
वो मुझमे बसकर मेरा सारा जहाँ समझती है
मुझको सबसे ज्यादा बस माँ समझती है
वो कटे-फ़टे,उधड़े रिश्तों पर सिलाई करना जानती है
वो मुझे बिना परखे मुझपर भरोसा रखती है
मुझको सबसे ज्यादा बस माँ समझती है
माँ तुम में क्या बात है,"गुरू"समझ नही पाया
तुम खाना बनाती हो,तब घर में रौनक सजती है
मुझको सबसे ज्यादा बस माँ समझती है
Very nice.... ����
ReplyDelete👍👍👍
ReplyDeleteNice
ReplyDeleteअति सुंदर रचना महोदय||आपका बहुत बहुत अभिनंदन है 🙏🙏🙏
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